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बड़े कॉन्ट्रैक्टर जॉब्स के लिए पेमेंट शेड्यूल कैसे बनाएं

मील स्टोन पेमेंट क्यों जरूरी हैं

₹15 लाख+ के प्रोजेक्ट पर काम पूरा होने पर पूरा पेमेंट मांगने से दो समस्याएं होती हैं: आपको हफ्तों तक सारी लागत अपनी जेब से भरनी पड़ती है, और फाइनल बिल क्लाइंट को बहुत भारी लगता है।

मील स्टोन पेमेंट्स दोनों समस्याओं का हल हैं।

स्टैंडर्ड 3-पेमेंट स्ट्रक्चर

एडवांस (30%): काम शुरू होने से पहले। मटीरियल ऑर्डर करने और शेड्यूल फिक्स करने के लिए।

प्रोग्रेस पेमेंट (40%): किसी क्लियर मील स्टोन पर — फ्रेमिंग पूरी, रफ-इन हो गया, बीच का इंस्पेक्शन हो गया। ये दिखने वाली प्रोग्रेस से जुड़ा होना चाहिए, कैलेंडर डेट से नहीं।

फाइनल पेमेंट (30%): काम पूरा होने और वॉकथ्रू के बाद। छोटा फाइनल पेमेंट = कम झिझक।

मील स्टोन कैसे सेट करें

मील स्टोन्स होने चाहिए:

बहुत बड़े जॉब्स के लिए (₹40 लाख+)

4-5 पेमेंट स्ट्रक्चर इस्तेमाल करें:

कोटेशन में डालें

हर कोटेशन में पेमेंट शेड्यूल साफ-साफ लिखा होना चाहिए:

"पेमेंट शेड्यूल:

  1. 30% एडवांस (₹1.8 लाख) स्टार्ट डेट रिजर्व करने के लिए
  2. 40% (₹2.4 लाख) [मील स्टोन] पूरा होने पर
  3. 30% (₹1.8 लाख) फाइनल वॉकथ्रू पर"

आपका अगला स्टेप: अपने अगले बड़े कोटेशन को एक ही फाइनल पेमेंट की बजाय 3 पेमेंट मील स्टोन्स के साथ स्ट्रक्चर करें।